भगवान श्रेंयासनाथजी के निर्वाण महोत्सव पर कई कार्यक्रम आयोजित

निवाई - सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में आचार्य विभव सागर महाराज के सानिध्य में भगवान श्रेंयास नाथ का निर्वाण महोत्सव अनेक धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ मनाया गया। चातुर्मास कमेटी के प्रवक्ता विमल जौंला व राकेश संधी ने बताया कि महोत्सव के उपलक्ष्य पर भगवान श्रेंयास नाथ का निर्वाण लड्डू चढाने का सोभाग्य सत्यनारायण विनोद कुमार गिर्राज प्रसाद महेश कुमार एवं पवन कुमार जैन मोठूका को प्राप्त हुआ। इस दौरान श्रद्धालुओं ने श्री जी का कलशाभिषेक शान्तिधारा एवं विष्णु कुमार मुनि सहित 700 मुनिराजों का पूजन गाजे बाजे के साथ किया गया इस अवसर पर जैन समाज के श्रद्धालुओं ने गाजे बाजे के साथ भगवान श्रेंयास नाथ के सामूहिक निर्वाण लड्डू चढाकर पूजा अर्चना की।
 जौंला ने बताया कि शुक्रवार को कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य शांति सागर महाराज की तस्वीर का लोकार्पण एवं दीप प्रज्वलन महावीर प्रसाद पराणा सुशील गिन्दोडी महिला मण्डल की अध्यक्ष शशि सोगानी सुनिता बडा़गाँव एवं सुवालाल चौधरी ने किया। सुनील भाणजा ने बताया कि रक्षाबंधन महापर्व पर
भामाशाह नेमीचन्द सिरस
अग्रवाल मंदिर कमेटी अध्यक्ष महावीर प्रसाद जैन मंत्री अशोक सिरस सत्यनारायण जैन जयकुमार जैन महेन्द्र जैन विमल जैन विष्णु बोहरा संजय सोगानी ज्ञानचन्द सोगानी सुरेश भाणजा सोभागमल सोगानी प्रेम चन्द सोगानी सहित कई जैन समाज के लोगों ने वात्सल्य राखी बांधकर गाजे बाजे के साथ नृत्य किए एवं रक्षाबंधन की पूजा अर्चना की। इस अवसर पर आचार्य विभव सागर महाराज ने देश के नाम संदेश देकर श्रद्धालुओं को सम्बोधित किया। उन्होंने देश का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को एवं देश के गृहमंत्री अमित शाह को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया
महोत्सव पर देश भर से आये श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम में भाग लिया।



गुरु के बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान के बिना जीवन है बेकार - मुनि विभंजन सागर 

जयपुर। मानसरोवर के वरुण पथ दिगम्बर जैन मंदिर चल रहे चातुर्मास के दौरान भादो माह के विशेष प्रवचन श्रृंखला के दौरान मुनि विश्वास सागर और मुनि विभंजन सागर महाराज ने सोमवार को आयोजित धर्मसभा मे आशीर्वचन देते हुए कहा कि " भारत एक धर्म प्रधान देश है। भारत में सदियों से गुरु का महत्व रहा है। यहां की माटी एवं जनजीवन में गुरु को ईश्वरतुल्य माना गया है, क्योंकि गुरु न हो तो ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग कौन दिखायेगा ? गुरु ही शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और वे ही जीवन को ऊर्जामय बनाते हैं।मुनि विभंजन सागर ने कहा कि " जीवन विकास के लिए भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। गुरु का सानिध्य, प्रवचन, आशीर्वाद और अनुग्रह जिसे भी भाग्य से मिल जाए उसका तो जीवन कृतार्थता से भर उठता है। क्योंकि गुरु बिना न आत्म-दर्शन होता और न परमात्म-दर्शन होते है। इन्हीं की प्रेरणा से आत्मा चैतन्यमय बनती है। गुरु भवसागर पार पाने में नाविक का दायित्व निभाते हैं। वे हितचिंतक, मार्गदर्शक, विकास प्रेरक एवं विघ्नविनाशक होते हैं। उनका जीवन शिष्य के लिये आदर्श बनता है। उनकी सीख जीवन का उद्देश्य बनती है, आचार्यों ने भी गुरु की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए लिखा है- गुरु यानी वह अर्हता जो अंधकार में दीप, समुद्र में द्वीप, मरुस्थल में वृक्ष और हिमखण्डों के बीच अग्नि की उपमा को सार्थकता प्रदान कर सके। मुनि विश्वास सागर ने कहा कि "  गुरु-शिष्य के आत्मीय संबंधों को सचेतन व्याख्या देता है। काव्यात्मक भाषा में कहा गया है- गुरु पूर्णिमा के चांद जैसा और शिष्य आषाढ़ी बादल जैसा। गुरु के पास चांद की तरह जीए गये अनुभवों का अक्षय कोष होता है। इसीलिये गुरु की पूजा की जाती है प्राचीन काल में विद्यार्थियों से शुल्क नहीं वसूला जाता था अतः वे साल में एक दिन गुरु की पूजा करके अपने सामथ्र्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा देते थे। पंचम काल से पहले यह प्रथा प्रचलित थी लेकिन धीरे-धीरे गुरु-शिष्य संबंधों में बदलाव आ गया। कहा गया है कि अगर आप गुरु की ओर एक कदम बढ़ाते हैं तो गुरु आपकी ओर सौ कदम बढ़ाते हैं। कदम आपको ही उठाना होगा, क्यों यह कदम आपके जीवन को पूर्णता प्रदत्त करता है।


 



जो संसार के समस्त दुखों से निकालकर उत्तम सुख को प्राप्त करता है वह है धर्म - मुनि विभंजन सागर 

जयपुर। मानसरोवर के वरुण पथ दिगम्बर जैन मंदिर चल रहे चातुर्मास के दौरान भादो माह के विशेष प्रवचन श्रृंखला के दौरान मुनि विभंजन सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा जो मानव कार्य  हितकारी और अहितकारी पुण्य और पाप धर्म-कर्म तत्व को नहीं जानता वह प्राणी सम्यकत्व से रहित मिथ्या दृष्टि है जो मन से कुछ सोचते हैं वचनों से कुछ बोलते हैं और काया से विपरीत कुचेष्टा करते हैं दिगंबर मुद्रा के धारी मुनियों की सदैव निंदा करते हैं वह  ज्ञान से रहित होता है उसे तो यह भी पता नहीं होता कि क्या करने योग्य है और क्या करने योग्य नहीं है हमारे कार्य से आत्मा का विकास होगा या आत्मा का विनाश होगा आत्मा का कल्याण होगा या आत्म कल्याण होगा मुनिश्री ने बताया मिथ्या दृष्टि जीव हित अहित को नहीं जानते अपितु अहित में ही हित समझते हैं पुण्य पाप क्या है इसे नहीं समझते और विवेक शून्य होकर कार्य करते हैं पुण्य है जो ईष्ट वस्तु को प्रदान करता है और पाप है जो अनिष्ट वस्तु को प्रदान करता है पुण्य अनुकूलता लाता है और पाप प्रतिकूलता देता है पुण्य सुख लाता है और पाप दुख देता है अज्ञानी पुण्य को नहीं समझते आत्म कल्याण को नहीं समझते धर्म अधर्म को नहीं समझते कि वह धर्म का स्वरूप क्या है और अधर्म का स्वरूप क्या है धर्म से कल्याण होता है या अधर्म से अकल्याण होता है मिथ्या दृष्टि जीव धर्म अधर्म के विवेक से सुन्न होते हैं मुनिश्री ने कहा जिन आगम जिनागम में धर्म का स्वरूप इस प्रकार से प्रतिपादित किया है की जो प्राणियों को संसार के दुखों से निकाल कर उत्तम सुखों को प्राप्त कर आता है वह धर्म है धर्म से प्राणी पावन होता है और अधर्म से प्राणी पतित होता है अधर्म करने से पाप कर्म का आश्रव होता है और धर्म करने से पुण्य का आश्रव होता है मुनि श्री ने बताया जैन दर्शन में सात तत्व माने गए हैं परंतु मिथ्या दृष्टि तत्व को नहीं जानते की तत्व क्या है  जिस कारण वह संसार के समस्त दुखो को भोगते रहते है |इसी प्रकार लोक में जीव रहित शरीर को शव कहते है धर्म ही है जो समस्त दुखो से निकालकर उत्तम सुख को प्राप्त कराता है|



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