त्रिदिवसीय संयम दीक्षा महोत्सव भक्ति भाव से सम्पन्न

कतारगाम सकल दिगंबर जैन समाज त्रिदिवसीय दीक्षा महोत्सव मनाया श्रद्धालुओं द्वारा सुबह अभिषेक शांतिधारा की गई।  श्री विद्यानन्द स्वामी दिगम्बर जैन मंदिर, कतारगाम-सूरत में विराजमान  मुनिश्री 108 अमितसागर जी महाराज की 36वीं एव सघस्थ मुनिश्री 108 अनमोल सागरजी महाराज की 14वी संयम दिक्षा महोत्सव 8 अक्टूबर 2019 को भव्यता के साथ सप्पन्न हुआ । चरण पक्षालन कर गुरूवर को पिच्छिका भेंट की जिसमे गुरुदेव की 36 थाली से पाद पूजा, 36 प्रकार के अष्ठ द्रव्य से सामूहिक पूजन की गई।  तथा 36 ग्रथ भेंट किये गए। साथ मे गुरूदेव के 36 ग्रथो का विमोचन किया गया एवं पिच्छी परिवर्तन कार्यक्रम भक्ति भाव व हर्षोल्लास से सम्पन्न हुआ।
धर्मसभा प्रवचन में गुरुदेव ने कहा 
अगर आपकी रोटी और बेटी सुरक्षित है तो आपका घर सुरक्षित है, समाज सुरक्षित है, धर्म सुरक्षित है देश सुरक्षित है। अगर ये दोनों चीज खराब हुई तो आप कितना धर्म की बात कर लो, कितनी भी पूजा पाठ कर लो सब बेकार है कार्यक्रम में फिरोजाबाद, टूंडला, आगरा, मैनपुरी, इटावा, दिल्ली,सोनीपत,जयपुर,अजमेर,कानपुर,चोरु, उदयपुर, सहरानपुर, इचलकरंजी, मुम्बई, फलटण, आरा(विहार) से संयम दीक्षा महोत्सव में  भारत से कई जगह से गुरुभक्त श्रद्धालु पधारे |



ज्ञान से ध्यान की सिद्धि होती है -मुनि विभंजन सागर

वरुण पथ दिगम्बर जैन मंदिर चातुर्मासरत श्रमणमुनि पूज्य विभंजन सागर मुनिराज ने धर्म सभा प्रवचनों में कहा कि जीव को संसार मे जन्म मरण करने का अच्छा अभ्यास से विषय भोग का खाने पीने का सोने का रोने का परिग्रहसग्रह करनेका राग द्वेष कषाय करने का अच्छा अभ्यास है परन्तु ज्ञान का अभ्यास नही किया किया गया प्राप्त करने का अभ्यास नहीं किया जिसके कारण भव भव में भ्रमण कर रहा आचार्यो ने कहा है कि सम्यक रीति से प्राप्त किया गया ज्ञान जीवनमें सौम्यता और सरलता लाता है ज्ञान के बिना जीवन मे अंधकार हैऔर चारित्र एवम चर्या भी अपूर्ण है 
मुनि श्री ने बताया कि सतत ज्ञानाभ्यास करने से उपयोग की धारा शुभ रहती है मन स्थिर रहता है और सदाश्रुत कि आराधना करता है वह निश्चित एक ना एक दिन ज्ञान को प्राप्त कर लेता है ज्ञान चरित्र का प्रवेश द्वार है ध्यान का मूल कारण है मोक्ष मार्ग का एक अभिन्न अंग है ज्ञान साधु जीवन का आधार स्तम्भ है इलिये सम्यक दर्शन पूर्वक सम्यकज्ञान  को प्राप्त करो क्योंकि ज्ञान केबिना कर्म क्षय का उपाय प्राप्त नही हो सकता और कर्म क्षय के बिना जीव मोक्ष रूपी निधि को प्राप्त नही कर सकता स्वार्थसिद्धि के कारण यह जीव सिद्ध को प्राप्त नही कर सकता जब जीव आत्म बोध को प्राप्त होकर सिद्ध पद को प्राप्त करता है तब उसे ध्यान की सिद्धि प्राप्त होती है इसलिए सदा आर्षग्रन्थों का विधिपूर्वक स्वाध्याय करो क्योंकि स्वाध्याय से ही ध्यान ज्ञान की सिद्धि होगी |



कल निकाली जाएगी मंदारगिरी बिहार में  तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की भव्य शोभायात्रा निर्वाण लाडू चढ़ायेंगे

जैन धर्म के 12 वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी के निर्वाण महोत्सव पर कल गुरुवार को मंदारगिरी में भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी।

शोभायात्रा की रूपरेखा एक नजर में
क्षेत्र प्रबंधक पवन कुमार जैन ने बताया कि भगवान वासुपूज्य की प्रतिमा जी को सुसज्जित रथ पर विराजमान कर प्रातः 6 बजे बौंसी स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर से गांधी चौक , हनुमान चौक , वापस मधुसूदन मंदिर , पंडा टोला , बारामती जैन मंदिर , पापहरणी रोड के रास्ते मंदार पर्वत तलहटी स्थित जैन मंदिर तक भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी।  तत्पश्चात जैन श्रद्धालु पारंपरिक केसरिया परिधान में प्रतिमा जी को अपने मस्तक पर लेकर मंदार पर्वत शिखर स्थित जैन मंदिर तक जाएंगे। जहां विधि विधान पूर्वक भगवान वासुपूज्य का महामस्तकाभिषेक , जलाभिषेक , शांतिधारा व विशेष पूजन-अर्चना के उपरांत जैन अनुयायी धूमधाम के साथ भव्य निर्वाण लाडू चढ़ायेंगे।

निर्वाणोत्सव की तैयारी पूरी।
भगवान वासुपूज्य निर्वाण महोत्सव के आयोजन व पर्युषण महापर्व को लेकर मंदारगिरी में धूम है। इस आयोजन की तैयारी मंदारगिरी दिगम्बर जैन प्रबंधन द्वारा कर ली गई है। दिगम्बर जैन मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है और रथ का रंग-रोगन कर तैयारी पूरी कर ली गई है। इस अयोजन पर काफी संख्या में जैन तीर्थयात्रियों का सम्मिलित होने की संभावना है।

आज ही के दिन भगवान वासुपूज्य को मंदार से प्राप्त हुआ था मोक्ष
मालूम हो कि भगवान वासुपूज्य स्वामी का तप , ज्ञान व निर्वाण स्थली मंदारगिरी की पावन धरा ही है। बताया गया कि भाद्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को मंदारगिरी पर्वत शिखर के चोटी से ही भगवान वासुपूज्य को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।

नौवें दिन मनाया गया उत्तम आकिंचन्य धर्म , उत्तम ब्रह्मचर्य के साथ पर्व का आज समापन।
जैन धर्मावलंबियों के दस दिवसीय महापर्व दशलक्षण के नौवें दिन बुधवार को उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना की गई। प्रातः बेला जिनालय में विधिवत रूप से नित्य अभिषेक , शांतिधारा व विशेष पूजा-पाठ किया गया।
इस दौरान भक्तिपूर्ण वातावरण में मंगलाष्टक स्त्रोत्र , मंगल पाठ , विनय पाठ के पश्चात जैन श्रद्धालुओं ने उत्तम आकिंचन्य धर्म को अंगीकार कर समुच्चय पूजन , रत्नत्रय पूजा , सोलहकारण पूजा , दसलक्षण धर्म पूजा श्रद्धापूर्वक किया। वहीं संध्या बेला में भजन , महाआरती का आयोजन किया।
इस अवसर पर देश के अन्य प्रांतों से पहुंचे जैन तीर्थयात्रियों के अलावे क्षेत्र प्रबंधक पवन कुमार जैन , उपप्रबंधक राकेश जैन , उपेंद्र जैन , राहुल जैन सहित विपिन जैन , प्रवीण जैन , नीतू जैन , शिल्पी जैन , खुशी जैन , मिंकू जैन आदि काफी संख्या में जैन श्रद्धालु शामिल हुए।

मैं और मेरा का त्याग करना ही है आकिंचन्य धर्म
मीडिया प्रतिनिधि प्रवीण जैन ने बताया कि त्याग करने के पश्चात त्याग के अहं का भी त्याग करना आकिंचन्य धर्म है। ' मैं ' और ' मेरा ' ये भी एक परिग्रह है जिसे त्याग करना आकिंचन्य धर्म है। उत्तम आकिंचन्य धर्म हमें मोह को त्याग करना सिखाता है। मोक्ष महल तक पहुंचने के लिए आत्मा के भीतरी मोह का त्याग करके ही आत्मा को शुद्ध बनाया जा सकता है। सब मोह पप्रलोभनों और परिग्रहों को छोड़कर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। इस संसार में हमारा कुछ भी नही है यहां तक कि यह शरीर भी हमारा नही है ऐसा विचार करते हुए हमें आकिंचन्य धर्म अंगीकार करना चाहिए।



और वीडियो देखे
  • जैन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है, आपकी क्या राय है -



    100 %
    0 %
    0 %
और देखे