निर्भय मन का, दुर्बल तन का,एक फरिश्ता आया था - सुनील सागर जी 

Jainism

प्रतापगढ़ - आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने कहा निर्भय मन का, दुर्बल तन का,एक फरिश्ता आया था, जिसने ताकतवर दुश्मन को बिन हथियार  जिताया था। उन्होंने गाँधीजी को याद करते हुए कहा कि जिनवाणी के मंच पर उनके सत्य, अहिंसा के बल पर  भारत को स्वतत्रता दिलाई थी। इसीलिए हम उनको याद करते है।
     बचपन से गाँधीजी का मन निर्मल था। सत्य के साथ जीना बचपन के मा के संस्कारो  से था। स्कूल मे जब परीक्षा हुई तो गुरुजी ने नकल करने को कहा लेकिन उन्होंने अस्वीकार कर दिया। उनका जीवन ही उनका संदेश था। उनकी शान्ती को देखकर  ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में सन्त न होते भी महात्मा कहा। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, व अहिंसा के सूत्र उनके जीवन में अवतरित हुए। भगवान महावीर के सूत्रों को उन्होंने जीवन मैं अवतरित किया था। दुश्मन से भी दोस्ती की तरह जीने वाले गाँधीजी को उस समय जब ट्रैन से फेका गया उसी स्टेशन पर आज उनका स्टेच्यू बना है। आचार्य श्री ने कहा कि आप भी कर्म मे फसी हुयौ आत्मा को मुक्त कर परमात्मा बने।
    


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