भक्ति की आंखों से ही परमात्मा दिखाई पड़ता है - पुलक सागर जी 

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बांसवाड़ा - आचार्य श्री पुलक साग़र जी महाराज ने कहा भक्ति की आंखों से ही परमात्मा दिखाई पड़ता है। उन्होंने कहा हम स्वयं को दर्पण बना सकते है, लेकिन जगत को नही। जिस दिन हमारा ह्रदय दर्पण की तरह  निर्मल हो जाएगा, उस दिन अपने आप परमात्मा का प्रतिबिंब दिखने लग जाएगा। परमात्मा भक्ति का नीर ही ह्रदय के दर्पण को स्वच्छ बना सकता है, इसीलिए कहता हूं भक्ति स्वयं को दर्पण बनाने की कला है। वैसे तो दर्पण हम स्वयं ही है, लेकिन उस पर काम वासना की धूल जमी हुई है। हमे मात्र उस धूल को झाड़ना है। यदि दर्पण पर धूल जम जाए तो उसमे प्रतिबिंब दिखाई नही पड़ता फिर वह दर्पण - दर्पण नही पत्थर बन जाता है। 
   आचार्य ने कहा कि राजघराने मे जन्म लेने वाली मीरा नारायण कृष्ण के प्रेम में ऐसी दीवानी हुई कि वह सन्यास ग्रहण कर उन्हे खोजने निकल पड़ी। मीरा कहती है कि मैने एक को चुन लिया एक को सब कुछ अर्पण कर दिया। अब मेरी दुनिया के दो ही रखवाले है, अब तो उनके साथ ही भक्ति की शैया पर ही लौटूँगी। कृष्ण को पाना है तो मीरा बनो।
    


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