हिन्दी वर्णमाला मे ऐसा कोई अक्षर नहीं जिसमे मंत्र बनने की शक्ति न हो - मुनिश्री 

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विदिशा - हिन्दी वर्णमाला का ऐसा कोई अक्षर नही, जिसमें मंत्र वनने की शक्ति न हो" उसी प्रकार ऐसी कोई वनस्पति या पत्ती या जड़ नहीं, जिसमे औषधी वनने की क्षमता न हो, आवशकता है उन अक्षरों के संयोजना की एवं उस वनस्पति के औषधी गुणों को पहचानने की जो इसका अच्छा संयोजन कर लेता है, वह योग्य विद्वान और चतुर वैद्य कहलाता है। उपरोक्त उदगार मुनिश्री समतासागर जी महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये। उन्होंने आचार्य गुरूवर श्री विद्यासागरजी महाराज की ये पक्तीयां सुनाते हुये कहा कि  "ऐसा कोई मकान नहीं जिसमें कोई खिड़की या दरवाजा न हो, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसमें कोई विशेषता न हो"हर व्यक्ती में कोई न कोई योग्यता या विशेषता होती है,उसको पहचान कर उस व्यक्ती की क्षमता अनुसार उस कार्य को  जिम्मेदारी के साथ संयोजना करने वाला व्यक्ति ही संयोजक कहलाता है। ऐसा व्यक्ति ही समाज के उद्देश्य को पूर्ण कर सकता है।इसके विपरीत नीतिकार भी कहते है, कि न नाडी़ देखी और न उसकी प्रकृति देखी, यदवा तदवा यंहा वंहा से कुछ भी उठाया और कुछ भी मिला दिया तो उस मरीज का भविष्य भी यदवा तदवा हो जाया करता है, इसी प्रकार समाज में सही व्यक्ति के द्वारा ही सही जानकारी दी जाना चाहिए अजानकारी से किया गया कार्य कभी सफल नहीं होता है। और मनुष्य को यदवा तदवा वना देता है, और जानकारी से किया गया कार्य थोड़ा कमजोर भी हो तो वह समाज के भविष्य को अच्छा बना देता है। मुनि श्री ने कहा कि भले ही सिक्का खोटा हो लेकिन युक्ती पूर्वक वह खोटा सिक्का भी काम आ जाता है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी जो कि न्यायप्रिय,एवं धार्मिक व्यक्ति थे उनके सामने जब युद्ध की स्थिति बनी तो  वह आचार्य देशभूषण महाराज जी के पास आशीर्वाद लेंने पहुंचे और उनसे भाव पूर्ण शव्दों से निवेदन किया कि गुरूदेव हमें आशीर्वाद दो जिससे हम राष्ट्र के साथ न्याय कर सकें गुरूदेव ने उनको राष्ट्र की सुरक्षा के लिये विशाल दृष्टि रखते हुये आशीर्वाद प्रदान किया। मुनि श्री ने कहा कि कार्य कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता उसकी उचित संयोजना होंना चाहिए, उचित संयोजना से बड़े से बड़ा कार्य कम श्रम से पूर्ण हो जाता है, आलस और प्रमाद से छोटा कार्य भी असफल हो जाता है।  उन्होंने खरगोश और कछुए की कहानी सुनाते हुये कहा कि आलस और प्रमाद वस वह खरगोश से वह धीरे धीरे चलने वाले कछुआ भी आगे वढ़ निकल जाता है, मुनि श्री ने कहा कि  आलस और प्रमाद से छोटे से छोटा कार्य भी खराब हो जाते है, उन्होंने कहा विदिशा नगर में चातुर्मास की संयोजना वन रही है,और आचार्य गुरूवर श्री विद्यासागरजी महाराज का आशीर्वाद भी आप लोगों को मिल गया है। उस संयोजना में विदिशा नगर के प्रत्येक जैन परिवार का कुछ न कुछ योगदान होंना चाहिए।हालांकि कलश स्थापित भले ही कुछ परिवार कर पांऐं लेकिन भावनाओं का कलश तो विदिशा नगर ही नही अपितु संपूर्ण जिले के प्रत्येक परिवार को रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने पुण्य को क्षींण न होंने दें  यदि आपने अपने पास वाला पुण्य अपने पड़ोसी को दे दिया, तो आपके हाथ में आया हुआ पुण्य तो निकल ही जाएगा साथ ही वह आपके उस पुण्य को भी साथ ले जाऐगा जो अभी तक आपके पास था।

  इस अवसर पर ऐलक श्री निश्चय सागर जी महाराज ने भी सभा को सम्बोधित किया। उपरोक्त जानकारी   प्रवक्ता अविनाश जैन  ने प्रदान की 

            


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