जीवन में तीर्थ यात्रा ज़रूर करनी चाहिए, इसका अर्थ होता है नाली का गंगा में मिल जाना - पुलक सागर जी

Jainism

बांसवाड़ा - मोहन कॉलोनी स्थित भगवान आदिनाथ मंदिर में आचार्य पुलक सागरजी महाराज  ने अपने प्रवचन के माध्यम से बताया कि जीवन में हर किसी को तीर्थ यात्रा ज़रूर करनी चाहिए। तीर्थ यात्रा का अर्थ होता है नाली का गंगा में मिल जाना। नाली का पानी गंदा होता है, लेकिन गंगा में मिलकर पवित्र हो जाता है। सत्संग में 1 दिन जाओ, 1 घंटे को भी जाओ, एक घड़ी को भी जाओ या फिर एक क्षण को भी जाऊंगा, लेकिन अंतर मन से जाओ। अंतर मन से किया गया, सत्संग जीवन की धारा बदल देता है। आचार्य जी ने कहा कि सत्संग तो आदत मत बनने दो। जब आदत बन जाता है तो फिर कोई चमत्कार नहीं होता है। बिना जरूरत के दवा खाई जाए तो जहर का काम करती है। सत्संग भी समय-समय पर होना चाहिए। दवा रोग के अनुसार ही दी जाएगी रोगी के अनुसार नहीं। ज्ञानी तुम्हारे रोग को समझते हैं, तुम्हारी बीमारी को समझते हैं। उनके अनुसार ही दवा लेते हैं। केवल दवा से काम नहीं चलेगा, दवा के साथ दुआ भी चाहिए। आचार्य जी ने कहा कि कोई महापुरुष अभी तुम्हारे लिए दुआ कर ले तो तुम्हारा कल्याण निश्चित है। तपस्यों की दुआएं खाली नहीं जाती। मुनि जब आहार लेते हैं दुआ करता कि है भगवान मेरी प्रेम और स्नेह बना रहे। तुम्हारे लिए भगवान से मुनि कितनी बड़ी प्रार्थना करता है। आचार्य जी ने कहा कि मुनि जन की प्रार्थनाएं कभी खाली नहीं जाती। निश्चित ही पूर्ण होते हैं। आहार दान श्रावक का,श्रावक  जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। आचार्य ने कहा कि जिस घर में साधु संतों के पैर नहीं पड़ते वे घर श्मशान की तरह होते हैं। क्योंकि सारी दुनिया पूरा ब्रह्मांड महा श्मशान है, शायद आपको पता ना हो कि आप जहां बैठे हैं जिस जगह में कम से कम 10 मोटे दफन हैं। उसके नीचे खड़े हुए हैं। आचार्य जी ने कहा कि आश्चर्य मत करो ठीक करता हूं, आज यहां बस्तियां हैं कल यहां श्मशान थे। कल फिर यहां बस्तियां होगी। संसार परिवर्तनशील है।


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