आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अरिहंत परमेष्ठी की आवश्यकता है :- आचार्य विभव सागर जी

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निवाई 19 जुलाई। आचार्य विभव सागर जी महाराज ने  कहा कि आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अरिहंत परमेष्ठी की आवश्यकता है साधु की चर्या 24 घंटे समयसार का उपदेश देती है आचार्य श्री ने कहा कि भगवान बनने आए थे लेकिन तुम संसारी बन गए पाप धोने आए थे लेकिन पापी बन गए आचार्य विभव सागर जी महाराज श्री दिगंबर जैन शांतिनाथ मंदिर पर धर्म सभा को संबोधित कर रहे थे उन्होंने कहा कि वास्तविक ज्ञान गुरु के सानिध्य से ही हासिल किया जा सकता है जिस तरह डॉक्टर और वकील को डिग्री हासिल करने के बाद बी अनुभवी से साल 2 साल की प्रैक्टिस सीखनी पड़ती है ठीक उसी तरह ज्ञानी को गुरु की शरण लेनी पड़ेगी तभी वह सही मार्ग समझ सकेगा फिर वह न खुद भटकेगा और ना ही किसी को भटकने की गलत दिशा दे सकेगा जो खुद ही सही दिशा का ज्ञाता है वही तो दूसरे को सही रास्ता बता पायेगा अनुभव और बिना कष्ट सहे किसी को न ज्ञान मिला है न भक्ति का आनंद और ना ही मोक्ष मिला है आचार्य विभव सागर जी महाराज ने कहा कि आनंद तो अनंत है वह सिखाया नहीं जाता बल्कि उसकी प्राप्ति के मार्ग बताए जाते हैं बिना कष्ट उठाए आनंद की अनुभूति संभव  नहीं है धर्म त्याग और संयम की नींव पर टिका है इसलिए पहले अपने मन व व्यवहार को बदलना ही पड़ेगा जब गुरु का सानिध्य प्राप्त होगा तब मंजिल के सही मार्ग पर चलने की ट्रेनिंग मिल सकती है किंतु यह ध्यान रहे कि साधन को कभी आनंद मत मानना पहले कर्म योगी बने जिससे हम मनुष्य जीवन की दशा सुधार सकें उन्होंने कहा कि आज के भौतिक युग में मिथ्यात्व पनप रहा है और यही नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों में गिरावट का कारण है आचार्य श्री ने कहा कि मिथ्यादृष्टि मत बनो बल्कि सम्यक दृष्टि बनने का प्रयास करो गुरु के जब नजदीक जाओगे तब मंजिल की राह जरूर मिलेगी किसी लक्ष्य को बनाना तो सरल है परंतु उस पर चलना बहुत कठिन है मोक्ष की भावना सब रखते हैं परंतु उस पर चलने के भाव तनिक भी नहीं है जब देव शास्त्र गुरु के निकटता का संबंध ही दूर हो रहा है फिर मोक्ष कैसे मिलेगा कलेक्टर और राष्ट्रपति बनने की चाह बहुत लोग रखते हैं परंतु पढ़ना कोई नहीं चाहता फिर क्या बिना पढ़े बिना कष्ट के किसी को डिग्री या पद मिले हैं यही धर्म का सिद्धांत है जब गुरु के निकट जाकर उनके ज्ञान उनकी तपस्या उनके सिद्धांत अपने जीवन में व्यवहार बनकर उतरने लगेंगे तभी हम जीवन को धर्म के अनुकूल परिवर्तन कर पाएंगे कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ेगा बिना कष्ट के मंजिल न मिली है मैं मिलेगी त्याग और संयम का पसीना बाहों तो 1 दिन निश्चित आनंद को अनुभव कर पाओगे जैन समाज के प्रवक्ता विमल जौंला व राकेश संगी ने बताया कि प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण  सतीश चन्द  मोरी लाल भाणजा ने किया। सांयकाल पंचपरमेष्ठी एवं आचार्य श्री की आरती का आयोजन किया गया । जौंला व संधी ने बताया कि 21 जुलाई रविवार को आचार्य विभव सागर महाराज का चातुर्मास मंगल कलश स्थापना का भव्य कार्यक्रम दोपहर 1 बजे से अग्रवाल सेवा सदन में अनेक धार्मिक अनुष्ठानो के साथ आयोजित किया जाएगा।


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