बन्धनो से बढ़कर और कोई दुख नही - साध्वी चारुप्रज्ञा

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 चित्तौडगढ - जब कभी कुछ करने को उत्साहित होते हैं और सक्रियता अपनाना चाहते हैं तो बेड़ियां कस जाती हैं। हाथ की कड़ियां जकड़ जाती हैं। बंधन कड़े हो जाते हैं। और कहते हैं बस आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। सोचने भर की स्वाधीनता है करने की नहीं।  मालिक की मर्जी के बिना बन्दी क्या कर सकता है।  मन मार कर चुप ही रह जाना पड़ता है। विवशता में कुछ कर सकना सम्भव भी कैसे हो सकता है? आकांक्षा अवश्य आगे बढ़ने की थी पर निविड़ बन्धन की जटिलता कहां कुछ करने दे सकती है? कितने कष्टकारक हैं यह बन्धन। कितनी भयंकर हैं यह जंजीरें, जिनके रहते प्रकाश की ओर एक कदम भी बढ़ाना सम्भव नहीं। अन्धकार से तनिक भी छूटने की
गुंजाइश नहीं। उक्त मंगल उदगार आज प्रात: पंचवटी चित्तौडगढ मे छाजेड निवास के प्रवचन पण्डाल मे प्रवचन देते हुए व्यक्त किए उन्होने कहां नशे में गन्दी नाली में पड़ा हुआ शराबी भी बहिश्त के मजे लेता रहता है पर जब होश आता है तब उसे अपनी दयनीय दशा का पता चलता है। बन्धनकारी तत्व यह जानते हैं कि कैदी बन्धन तुड़ाने का प्रयत्न कर सकता है इसलिये नशा पिलाते रहने की उन्होंने पूरी व्यवस्था रखी है। ताकि बन्धन कष्टकारक दीखने की अपेक्षा और भी अधिक मनोरम लगने लगें।  हम नशा पीते और बन्धनों को सराहते इन बहुमूल्य क्षणों को ऐसे ही गुजारे दे रहे हैं। बन्धन जिसने जीवन का प्रयोजन ही भ्रष्ट कर दिया। आखिर है क्या? गम्भीर विचार परायणता ही इसका हल निकाल सकती है बन्धन दीखते तो हैं नहीं? हाथ-पांव तो खुले हैं जेल या बाड़े में भी बन्द नहीं। चमड़े की आंखें तो इन बन्धनों को देख भी नहीं पातीं। सूक्ष्म दृष्टि ही इन अदृश्य बन्धनों को देख समझ सकती है। अज्ञान ,वासना तृष्णा,मोहमयी मदिरा ही है जिसने हमारी प्रज्ञा को कुण्ठित कर इन बन्धनों को स्वीकार करने के लिये सहमत किया है।   हम इन्हीं बन्धनों में बंध गये हैं। शास्त्र कहता है इन बन्धनों से बढ़कर और कोई दुख नहीं। समस्त शोक-सन्तापों के कारण यही हैं। प्रगति का अवरोध इन्हीं ने कर रखा है। जब तक यह खुलेंगे नहीं टूटेंगे नहीं दुर्गति का अन्त नहीं होगा। इन्हें काटो इन्हें तोड़ो। यही परम पुरुषार्थ है। मुक्ति की ओर चलो। यही इस जीवन की परम उपलब्धि है।
इससे पुर्व साध्वी जयप्रज्ञाजी म. सा ने धर्म सभा मे प्रवचन देते हुए कहां चिंतन करें कि हम प्रमाद और धर्म में कितना समय व्यतीत कर रहे हैं संसार के प्रति रुचि और आध्यात्म के प्रति अरुचि प्रमाद है। प्रमाद आत्मा का विस्मरण है। मनुष्य जीवन बहुत मूल्यवान ही  इसमें यह चिंतन करना चाहिए कि हम प्रमाद में कितना और धर्म में कितना समय व्यतीत कर रहे है। प्रमाद जितना घटता है, उतनी आत्मा के प्रति जागरूकता आती है।
लेकिन अधिकांश लोग धर्म के बजाए संसारी बातों में उलझे रहते हैं।


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