संत की हिंसा करना मानवता, धर्म और अध्यात्म की हिंसा है - पुष्पदंतसागरजी

 पुष्पगिरी - संत समाज के मक्खन हैं। मक्खन से ही घी प्राप्त होता है। मोक्ष का मार्ग, मुक्ति का मार्ग संतों से प्रारंभ होता है कंसाें से नहीं और हां इतिहास भी साक्षी है कि जब-जब जरूरत पड़ी संत-महात्माओ ने ही संकटों से धर्म और देश संस्कृति की रक्षा की है। कृष्ण ने कंस को, राम ने रावण को, महावीर ने मृत्यु को सबक सिखाया था। जिस प्रकार मलाई रहित दूध व्यर्थ है ठीक उसी प्रकार संत रहित समाज देश स्वछंद होती है। संत की हिंसा करना मानवता, धर्म और अध्यात्म की हिंसा है। सरकार को सावधानीपूर्वक विवेक के साथ पालघर की घटना को सत्यता का पता कर दोषियों को सख्त से सख्त सजा दें और संतों को बिना किसी भेदभाव के सुरक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए। यह बात पुष्पगिरि तीर्थ पर विराजमान तीर्थ प्रणेता गणाचार्य पुष्पदंतसागरजी महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि जैसे आप दूध से मलाई और मक्खन को संभाल कर रखते हैं उसी तरह समाज व सरकार संतों को भी संभालें। याद रखना जिस प्रकार लाइट रहित गाड़ी मंजिल न पाकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है उसी प्रकार संत रहित समाज व देश का अस्तित्व कुछ भी नहीं है। संत रहित देश व समाज कभी भी सत्य की ओर अग्रसर नहीं हो पाता। संत समाज और देश के मार्गदर्शक व चरित्र होते हैं।



जीवन में तीर्थ यात्रा ज़रूर करनी चाहिए, इसका अर्थ होता है नाली का गंगा में मिल जाना - पुलक सागर जी

बांसवाड़ा - मोहन कॉलोनी स्थित भगवान आदिनाथ मंदिर में आचार्य पुलक सागरजी महाराज  ने अपने प्रवचन के माध्यम से बताया कि जीवन में हर किसी को तीर्थ यात्रा ज़रूर करनी चाहिए। तीर्थ यात्रा का अर्थ होता है नाली का गंगा में मिल जाना। नाली का पानी गंदा होता है, लेकिन गंगा में मिलकर पवित्र हो जाता है। सत्संग में 1 दिन जाओ, 1 घंटे को भी जाओ, एक घड़ी को भी जाओ या फिर एक क्षण को भी जाऊंगा, लेकिन अंतर मन से जाओ। अंतर मन से किया गया, सत्संग जीवन की धारा बदल देता है। आचार्य जी ने कहा कि सत्संग तो आदत मत बनने दो। जब आदत बन जाता है तो फिर कोई चमत्कार नहीं होता है। बिना जरूरत के दवा खाई जाए तो जहर का काम करती है। सत्संग भी समय-समय पर होना चाहिए। दवा रोग के अनुसार ही दी जाएगी रोगी के अनुसार नहीं। ज्ञानी तुम्हारे रोग को समझते हैं, तुम्हारी बीमारी को समझते हैं। उनके अनुसार ही दवा लेते हैं। केवल दवा से काम नहीं चलेगा, दवा के साथ दुआ भी चाहिए। आचार्य जी ने कहा कि कोई महापुरुष अभी तुम्हारे लिए दुआ कर ले तो तुम्हारा कल्याण निश्चित है। तपस्यों की दुआएं खाली नहीं जाती। मुनि जब आहार लेते हैं दुआ करता कि है भगवान मेरी प्रेम और स्नेह बना रहे। तुम्हारे लिए भगवान से मुनि कितनी बड़ी प्रार्थना करता है। आचार्य जी ने कहा कि मुनि जन की प्रार्थनाएं कभी खाली नहीं जाती। निश्चित ही पूर्ण होते हैं। आहार दान श्रावक का,श्रावक  जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। आचार्य ने कहा कि जिस घर में साधु संतों के पैर नहीं पड़ते वे घर श्मशान की तरह होते हैं। क्योंकि सारी दुनिया पूरा ब्रह्मांड महा श्मशान है, शायद आपको पता ना हो कि आप जहां बैठे हैं जिस जगह में कम से कम 10 मोटे दफन हैं। उसके नीचे खड़े हुए हैं। आचार्य जी ने कहा कि आश्चर्य मत करो ठीक करता हूं, आज यहां बस्तियां हैं कल यहां श्मशान थे। कल फिर यहां बस्तियां होगी। संसार परिवर्तनशील है।



राम नाम सत्य है, यही वाक्य जीवन का परम तत्व है, जो इसे पहचान लेगा वह कभी भटकेगा नहीं - मुनिश्री

राम नाम सत्य है। यह वाक्य शुभ कार्यों में उपयोग होने लगे और जिंदा लोगों को यह वाक्य सुनाना शुरू कर दें तो उस दिन से लोगों के जीवन का रंग रंग बदल जाएगा। अभी हमारे यहां परंपरा है शव यात्रा में लोग राम नाम सत्य है का उच्चारण करते हुए जाते हैं और यह बात हम मुर्दों को सुनाते हैं। जबकि शुभ कार्यों में राम का नाम लोग लेने लगेंगे तो उचित होगा। लोगों ने इसे एक ढर्रा बना रखा है जबकि जीवन का यह परम सत्य है और जो इसे पहचान लेगा वह कभी भटकेगा नहीं। यह बात भाग्योदय तीर्थ में विराजमान मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज ने ऑनलाइन शंका-समाधान में कही।
उन्होंने एक कहानी सुनाते हुए कहा कि एक शव यात्रा में लोग यह उच्चारण करते हुए जा रहे थे। एक पंडितजी ने जब सुना तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन पंडितजी के बगल में एक बच्चा रहता था उसने पहली बार शवयात्रा में राम नाम सत्य है सुना था तो रोज वह उन पंडितजी के घर के सामने से निकले और राम नाम सत्य है का उच्चारण करते हुए घर जाता। पंडित जी को बहुत बुरा लगता एक दिन पंडितजी उसके घर उसके पिताजी के पास पहुंचे। अपने बेटे को समझा लेना यह अशुभ शब्दों का उच्चारण करता है तो पिताजी ने पूछा कौन से अशुभ शब्द हैं तो और पंडितजी बताने को तैयार नहीं हुए। बाद में पंडितजी से क्षमा मांगी। बच्चे को समझा लूंगा पंडितजी चले गए तो बच्चे से पूछा कि कौन सा अशुभ था लड़के ने कहा मैंने तो राम नाम सत्य बोला है तो पिताजी ने कहा यही तो परम सत्य है। पति-पत्नी को एक दूसरे में परस्पर प्रेम और सामंजस्य बनाकर रहना चाहिए : मुनिश्री ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि पति पत्नी की भांति रहना चाहिए न की लाइफ पार्टनर की स्थिति में। अगर लाइफ पार्टनर की स्थिति में रहोगे तो आपस में सामंजस्य की कमी रहेगी। जिन्होंने मूलभूत संस्कारों को साथ में रखा है उन जोड़ों में कोई परिवर्तन नहीं आए हैं। जिन लोगों ने पश्चिमी सभ्यता को अपनाया है वहां ऐसी कठिन परिस्थिति आ रही है कि पति पत्नी के बीच में लगातार मनमुटाव है। एक दूसरे में परस्पर प्रेम और सामंजस्य बनाकर रहना चाहिए। सहजीवन में बहुत से समझौते करने पड़ते हैं नहीं तो तकलीफ बढ़ती जाती हैं। स्वतंत्रता और अहम को गौड़ करें। शांति संतोष को प्रमुखता देते हुए इसी के साथ जिएं एक दूसरे के साथ प्रेरक और पूरक बनकर रहें तो जीवन बहुत शानदार हो जाएगा। जहां तक सेल्फ डिपेंड की बात है पहले पिता पर डिपेंड थे फिर पति पर डिपेंड हुए और भविष्य में बच्चों पर डिपेंड होना पड़ेगा।।तो मुनिश्री ने कहा कि पति पत्नी पर डिपेंड कितना रहता है जिसकी पत्नी खो गई है उससे पूछो। एक दूसरे के पूरक होना चाहिए। आप अपने बच्चों की परवरिश ऐसे करो कि कल आपके बच्चे भी आप की परवरिश अच्छे तरीके से करें। और यह उनका दायित्व भी होगा।
गंदगी को साफ करना पाप नहीं है
: मुनिश्री ने कहा गंदगी को साफ करना यह पाप कर्म नहीं है। सब तरफ लॉकडाउन में सफाई कर्मचारी पूरी ताकत से जुटे हुए हैं। यदि वह अपने काम नहीं करते तो पूरा शहर गंदगी और बदबू से पट जाता। उन्होंने कहा ऐसी कोई स्थिति अपने यहां आती है तो गिलानी से उठकर यह कार्य करना चाहिए।



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