ड्राईवर से सीखे संगति का प्रभाव -  गणाचार्य विराग सागर जी

भिंड - परम पूज्य राष्ट्रसंत गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज ने पीयूष वाणी से धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में संगति का बड़ा महत्व प्रभाव होता है महापुरुषों की संगति से जीवन में अद्भुत परिवर्तन आता है स्व में अच्छाइयां गुण आने लगते हैं अच्छी दिशा में बढ़ने की रुचि उत्पन्न होने लगती जबकि इससे विपरीत दुर्जनों की संगति से वैसे ही दुर्गुण का उद्भव होने लगता है जीवन भिन्नता की ओर जाने लगता है अतः हमें सदैव श्रेष्ठ की संगति करनी चाहिए तथा बुरी संगति छोड़नी चाहिए संगति का प्रभाव देखना तो देखो ड्राइवर के पास बैठे सोने वाले व्यक्ति को बात करने वाले व्यक्ति को प्राय ड्राइवर को नींद आने लगती है बातों में उपयोग चला जाता है जिससे दुर्घटना निश्चित हो जाती है स्वयं और पर को चोट लग जाती हैं तभी तो ड्राइवर सीट सिंगल होती है कोई अन्न नहीं बैठ सकता है अतः वर्तमान में क्षण भर की बुरी संगति का ही प्रभाव चल रहा है करुणा का जिससे आप विकराल रूप सारे विश्व पर जमा लिया है कहां जा रहा है सोशल डिस्टेंस बनाएं मास्क लगाएं शासन प्रशासन के नियमों का पालन करें रोग ग्रसित लोगों से दूर रहें शायद व्यक्ति ऐसा करने में तत्पर हो जाता सावधान रहता तो शायद आज सारा विश्व देश प्रातः नगर समाज कोरोना से कम प्रभावित रहता। भैया जीवन में एक ऐसी ज्ञानदीप को प्रज्वलित करें कि आप स्वयं सारे परिवार समाज नगर प्रांत देश और विश्व को प्रकाशित करने वाली दीप बन जाए जो स्वयं श्रद्धा विश्वास गुणों से हीन होती है जो स्वयं प्रज्वलित नहीं तो वे अन्य को भी गुणवान एवं प्रकाशित कैसे कर सकते हैं नहीं कर सकते हैं। इसलिए जीवन में किसी की अच्छाई लाने में बहुत परिश्रम मेहनत करनी पड़ती है जबकि बुराइयां के लिए बड़ा आश्चर्य है कोई मेहनत नहीं सहज आ जाती है न स्कूल होते हैं ना पुस्तकें ना टीचर आदि आदि फिर भी कैसे आ जाती हैं तो भैया हम जैसे वातावरण व संगति में बैठते  उठते देखते रहते हैं उसका प्रभाव तो आता ही है अतः जो अच्छी दिशा की ओर अग्रसर हो प्रेरणा और प्रोत्साहन करते हो उनकी संगति करना चाहिए और सदैव अच्छाइयों गुण ग्रहण के प्रति उत्साही रहे कोई गलती बुराई बताएं बताए तो स्वीकार करें कोशिश प्रयत्न करें उसे सुधारने की तो भैया विश्वास कर सकते हैं कि आप 1 दिन सम्भल जाओगे गुणवान बन जाओगे।



निर्भय मन का, दुर्बल तन का,एक फरिश्ता आया था - सुनील सागर जी 

प्रतापगढ़ - आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने कहा निर्भय मन का, दुर्बल तन का,एक फरिश्ता आया था, जिसने ताकतवर दुश्मन को बिन हथियार  जिताया था। उन्होंने गाँधीजी को याद करते हुए कहा कि जिनवाणी के मंच पर उनके सत्य, अहिंसा के बल पर  भारत को स्वतत्रता दिलाई थी। इसीलिए हम उनको याद करते है।
     बचपन से गाँधीजी का मन निर्मल था। सत्य के साथ जीना बचपन के मा के संस्कारो  से था। स्कूल मे जब परीक्षा हुई तो गुरुजी ने नकल करने को कहा लेकिन उन्होंने अस्वीकार कर दिया। उनका जीवन ही उनका संदेश था। उनकी शान्ती को देखकर  ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में सन्त न होते भी महात्मा कहा। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, व अहिंसा के सूत्र उनके जीवन में अवतरित हुए। भगवान महावीर के सूत्रों को उन्होंने जीवन मैं अवतरित किया था। दुश्मन से भी दोस्ती की तरह जीने वाले गाँधीजी को उस समय जब ट्रैन से फेका गया उसी स्टेशन पर आज उनका स्टेच्यू बना है। आचार्य श्री ने कहा कि आप भी कर्म मे फसी हुयौ आत्मा को मुक्त कर परमात्मा बने।
    



भक्ति की आंखों से ही परमात्मा दिखाई पड़ता है - पुलक सागर जी 

बांसवाड़ा - आचार्य श्री पुलक साग़र जी महाराज ने कहा भक्ति की आंखों से ही परमात्मा दिखाई पड़ता है। उन्होंने कहा हम स्वयं को दर्पण बना सकते है, लेकिन जगत को नही। जिस दिन हमारा ह्रदय दर्पण की तरह  निर्मल हो जाएगा, उस दिन अपने आप परमात्मा का प्रतिबिंब दिखने लग जाएगा। परमात्मा भक्ति का नीर ही ह्रदय के दर्पण को स्वच्छ बना सकता है, इसीलिए कहता हूं भक्ति स्वयं को दर्पण बनाने की कला है। वैसे तो दर्पण हम स्वयं ही है, लेकिन उस पर काम वासना की धूल जमी हुई है। हमे मात्र उस धूल को झाड़ना है। यदि दर्पण पर धूल जम जाए तो उसमे प्रतिबिंब दिखाई नही पड़ता फिर वह दर्पण - दर्पण नही पत्थर बन जाता है। 
   आचार्य ने कहा कि राजघराने मे जन्म लेने वाली मीरा नारायण कृष्ण के प्रेम में ऐसी दीवानी हुई कि वह सन्यास ग्रहण कर उन्हे खोजने निकल पड़ी। मीरा कहती है कि मैने एक को चुन लिया एक को सब कुछ अर्पण कर दिया। अब मेरी दुनिया के दो ही रखवाले है, अब तो उनके साथ ही भक्ति की शैया पर ही लौटूँगी। कृष्ण को पाना है तो मीरा बनो।
    



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